Thursday, June 10, 2021

नरेंद्र मोदी : जनता की आस, विपक्ष की सास!!

 

7 जून को शाम 5 बजे लोगों के सामने आकर, प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने घोषणा कर दी की, केंद्र सरकार 18 साल और उससे आगे बड़े आयु वर्ग के लिए मुफ्त टीकाकरण प्रदान करेगी,  इससे जनता में ख़ुशी की लहर आ गयी और विपक्ष के पसीने छुट गए और साथ ही साथ उनके गले में ‘मोदी’ नाम का फंदा और भी पक्का हो गया.

इस लेख में, हम देखेंगे कि वैक्सीन निर्माणकार्य शुरू होने के बाद से विपक्ष ने समय-समय पर अपनी मांगों को कैसे बदला है, मोदी ने उनकी मांगों को कैसे स्वीकार किया और उन्हें बेनकाब किया? अब जब विपक्ष ने मांग फिर से बदल दी है, तो उन्होंने टीकाकरण की कमान को फिरसे अपने हाथ में ले लिया है।

इसकी शुरुआत कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष और अब भी बिना पद लिए अध्यक्ष की कमान संभल रहे, श्री राहुल गांधी जी से ही करते है।

9 अप्रैल को प्रधानमंत्री मोदी को लिखे एक पत्र में उन्होंने मांग की, कि राज्य सरकार को टीके खरीदने और योजना बनाने की इजाजत दी जाए और टीकाकरण सभी को उपलब्ध कराया जाए। जब 30 से अधिक उम्र के लोगों के लिए टीकाकरण खोला गया, तो उन्होंने एक महीने के भीतर फिर से फिर एक पत्र लिखा, जिसमें आरोप लगाया कि, देश में वैक्सीन की आपूर्ति कम है।

अब 'खेला होबे' वाली ममता बनर्जी (व्हीलचेयर फेम) की बात करते है,  उन्होंने बंगाल चुनाव से पहले 24 फरवरी को प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर मांग की थी कि, राज्यों को, राज्य के फंड से, वैक्सीन खरीदने का अधिकार दिया जाए। फिर मई में यू-टर्न लिया और मांग कि, की केंद्र सरकार वैक्सीन खरीदकर उनके राज्य और दूसरे राज्यों को भी सप्लाई करे. उन्होंने यह भी मांग की, कि टीकाकरण को सार्वजनिक किया जाए। हालांकि, वे यह भी जानती थी  कि वैक्सीन का उत्पादन कम है। लेकिन वह बंगाल चुनाव में केंद्र पर आरोप लगाना चाहती थी, कि केंद्र सरकार ने टीकाकरण अभियान ठीक से नहीं चलाया, वैक्सीन कम पड़ रही है।

मार्च में, दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल (टीवी फेम) ने मांग की, कि उन्हें वैक्सीन खरीदकर किस आयु वर्ग को दें? इसे निर्णय लेने का अधिकार होना चाहिए। देश में टीकों का उत्पादन बढ़ा है, इसलिए सभी के लिए टीकाकरण की नीति अपनाई जानी चाहिए। दो महीने बाद, मई में, दिल्ली में 18 से 44 साल के बच्चों के लिए टीकाकरण बंद कर दिया गया। फिर से, हमेशा की तरह, उन्होंने यू-टर्न लिया और केंद्र से हस्तक्षेप करने और टीका लगवाने की मांग की।

हमारे महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री, डब्ल्यूएचओ के सलाहकार, श्री उद्धवजी ठाकरे (फेसबुक लाइव फेम) ने भी अप्रैल में प्रधानमंत्री को एक पत्र लिखा, जिसमें आग्रह किया गया कि, 25 वर्ष से अधिक उम्र के सभी लोगों को टीका लगाया जाना चाहिए। इससे कुछ दिन पहले ही, उन्हें केंद्रीय मंत्रालय डांट मिली थी कि, टीकाकरण धीमा हो रहा है और उनके अपने मंत्री मई में कह रहे थे, कि हम एक 'वैश्विक निविदा' के माध्यम से वैक्सीन की खरीद करेंगे। हालांकि, आज तक, उन्होंने एक भी टीका नहीं खरीदा है। दूसरी ओर, महाराष्ट्र में 18 से 44 वर्ष के बीच के उन लोगों के लिए भी टीकाकरण रोक दिया गया है, जिनके  टीकाकरण की वह मांग कर रहे थे।

केरल के कमुनिस्ट पार्टी के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन, जो लुटियंस पत्रकारों द्वारा उठाये गए 'केरल मॉडल' को लागू कर रहे हैं, उन्होंने शुरू में घोषणा की, कि हम उन सभी को मुफ्त टीके उपलब्ध कराएंगे जो टीकाकरण के पात्र आयु वर्ग में आते  हैं और फिर प्रधानमंत्री से मांग की, कि वैक्सीन फ्री में उपलब्ध कराया जाए। सबको मुफ्त देंगे की घोषणा उन्होंने की, क्योंकि वे क्रेडिट खुद लेना चाहते थे। इसके बावजूद, उन्होंने ‘कोवाक्सिन’ वैक्सीन के बजाय केवल ‘कोविशील्ड’ वैक्सीन का उपयोग करना पसंद किया। ये है ‘केरल मॉडल’ की हकीकत।

उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव, जिन्होंने वैक्सीन को 'बीजेपी वैक्सीन' करार दिया था। बाद में उन्होंने मांग की कि सरकार लोगों को बताए, "सभी को टीका कब मिलेगा?"

उन सभी को पता था कि सरकार वैज्ञानिक तरीके से, आयु-आधारित टीकाकरण कार्यक्रम क्यों लागू कर रही है। ऐसा इसलिए था, क्योंकि केंद्र सरकार ‘टीकों के उत्पादन के साथ-साथ अत्यावश्यक लोगों के टीकाकरण’ ऐसी दोनों चीजो का समन्वय कर रही थी। हालांकि, राजनीतिक विपक्षियो ने बार-बार टीकाकरण को सभी के लिए खुला रखने का आह्वान किया है। ताकि टीकों की आपूर्ति कम होने पर सरकार पर राजनीतिक आरोप लगाए जा सकें। फिर जब राज्य को टीकाकरण का अधिकार दिया गया तो उसमे सब गड़बड़ कर दिया गया।

लेकिन मोदी ने कुशलता से उन्हें टीकाकरण के अधिकार दिए और उनका पर्दाफाश किया। अब लोगों के सामने यह सच सूरज की तरह साफ है कि, विपक्ष सिर्फ राजनीति कर रहा था और काम करने को तैयार नहीं है। इसके उलट मोदी बस चुपचाप अपना काम कर रहे थे और लोगों के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभा रहे थे। इससे लोगों का मोदी पर विश्वास और मजबूत हुआ साथ ही  ‘मोदी’ नाम का फंदा विपक्ष के गले में और कस गया।

इसके अलावा, कई राज्य के मुख्यमंत्रियों, मंत्रियों और कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने समय-समय पर अपनी मांगों को बदला है। इनमें सोनिया गांधी, प्रियंका गांधी, आनंद शर्मा, शशि थरूर, पी चिदंबरम, अभिषेक मनु सिंघवी, जयराम रमेश, मनीष तिवारी, रणदीप सुरजेवाला, कांग्रेस नेताओं के साथ-साथ अशोक गहलोत, भूपेश बघेल, हेमंत सोरेन और कैप्टन अमरिंदर जैसे मुख्यमंत्री भी शामिल थे। 

दिसंबर 2020 की शुरुआत में कांग्रेस के कई बड़े नेताओं ने, सफलतापूर्वक परीक्षण पूर्ण किए गए टीकों का उपयोग भारत में टीकाकरण के लिए की जानेवाली प्रक्रिया के बारे में संदेह पैदा करने का काम किया था। इस सूची में जयराम रमेश, शशि थरूर, मनीष तिवारी और आनंद शर्मा शामिल थे। इतना ही नहीं कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने प्रेस कांफ्रेंस करते हुए कोरोना वैक्सीन की प्रभावशीलता और संभावित दुष्प्रभावों पर सवाल उठाया। साथ ही, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, स्वास्थ्य मंत्री और अन्य कैबिनेट मंत्रियों और सभी मुख्यमंत्रियों को पहले टीका क्यों नहीं लगवाते? ऐसा सवाल उठाकर उन्होंने लोगों के मन में शंका पैदा कर दी।

श्रीमती सोनिया गांधी ने कहा, "मुझे पता है कि टीका कम है, फिर भी, सरकार से 25 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों के लिए टीकाकरण खुला करने की मांग करती हू।" उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि केंद्र राज्यों पर तानाशाही कर रहा है, उन्होंने जनवरी 2021 में कांग्रेस कार्य समिति की बैठक में एक मजबूत भाषण दिया था, जिसमें कहा गया था, "टीके बर्बाद नहीं होने चाहिए।" लेकिन त्रासदी यह है कि, उनके नियंत्रण वाले राज्यों में अधिकांश टीके बर्बाद हो चुके हैं। उदाहरण के लिए राजस्थान, झारखंड, छत्तीसगढ़।

कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने 12 अप्रैल से 'स्पीक अप फॉर वैक्सीन' अभियान के माध्यम से सभी के लिए टीकाकरण शुरू करने के लिए लोगों से आवाज उठाने का आग्रह किया और टीका समाप्त होने के बाद इस पर हल्लागुल्ला शुरू कर दिया।

आनंद शर्मा के नेतृत्व में सभी विपक्षी दलों ने मांग की, कि भारत एक 'संघीय व्यवस्था' वाला देश है। उसके  अनुसार, 'स्वास्थ्य' राज्य का मुद्दा है और आपदा आने पर भी राज्यों को टीके खरीदने का अधिकार दिया जाना चाहिए। केंद्र सरकार को इसे नियंत्रित नहीं करना चाहिए, क्योंकि यह संवैधानिक नहीं है। लेकिन जब केंद्र सरकारने राज्यों को अधिकार वापस कर दिए, तब पुरे टीकाकरण कार्यक्रम की बैंड बजा दी गयी।

कांग्रेस नेता शशि थरूर ने पहले 'वैक्सीन फ्रेंडशिप मिशन' के जरिए निर्यात की निंदा की और फिर निर्यात बंद कर दिया, तो वे कहने लगे, निर्यात क्यों बंद कर दी?

शशि थरूर और अभिषेक मनु सिंघवी दोनों ने मांग की, कि खुले बाजार में वैक्सीन को अधिक कीमत पर बेचा जाना चाहिए। फिर उन्होंने यू-टर्न लेते हुए कहा, 'वैक्सीन की कीमत अलग क्यों है? और सभी को मुफ्त में वैक्सीन मिलनी चाहिए।'

पूर्व केंद्रीय मंत्री और कांग्रेस नेता पी चिदंबरम ने पहले 'सभी के लिए टीकाकरण' का आह्वान किया था और 'वैक्सीन की कमी' के साथ शोर मचाना शुरू कर दिया। अगर वैक्सीन की सप्लाई कम है तो सबको देने की डिमांड क्यों?

अप्रैल में, राजस्थान कांग्रेस के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने केंद्र से सभी के लिए टीकाकरण खोलने, उम्र की सीमा न रखने की बात कही और यू-टर्न लेकर 26 अप्रैल को केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री से शिकायत कि, की वैक्सीन की उपलब्धता कम है।

एक तरफ कांग्रेस पूछ रही थी कि, मोदीजी ने हमारे बच्चों की वैक्सीन विदेश क्यों भेजी? वहीं दूसरी ओर उपलब्ध वैक्सीन बर्बाद की जा रही थी। इसी तरह पहले टीकों का निर्यात न करने की मांग की, वैक्सीन का निर्यात रोकने के बाद कहने लगे कि वैक्सीन का निर्यात क्यों बंद कर दिया?

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने भी अप्रैल में प्रधानमंत्री को एक पत्र लिखकर मांग की थी कि, 18 वर्ष से अधिक आयु के सभी लोगों के लिए टीकाकरण खोला जाए, और यह खुला करने के बाद, 18 से 44 वर्ष के बीच के लोगोने ,जिन्होंने ऑनलाइन पंजीकरण किया और टीकाकरण में भीड़ लगाई तब उन्होंने ही परेशानी व्यक्त की। छत्तीसगढ़ के स्वास्थ्य मंत्री टीएस सिंहदेव पहले स्वदेशी वैक्सीन सुरक्षित हैं या नहीं? ऐसा लोगों में डर पैदा कर रहे थे। वह इसपर ही नहीं रुके, बल्कि उन्होंने छत्तीसगढ़ में ‘कोवासिन’ वैक्सीन का उपयोग करना भी बंद कर दिया, यह कहते हुए कि यह सुरक्षित नहीं है। लोगों में डर फैलाने के बाद उन्होंने खुद को उसी वैक्सीन का इंजेक्शन लगवाया!

पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने भी अप्रैल में केंद्र से सभी के लिए टीकाकरण शुरू करने की मांग की थी। लेकिन उसके कुछ हफ्ते पहले ही पंजाब सरकार को चेतावनी दी गई थी कि, टीकाकरण की दर बहुत धीमी है। तो ध्यान दीजिये कि, जहां टीकों का ठीक से उपयोग नहीं किया जा सकता है, वहां राज्य मांग करता है कि टीका अधिक लोगों को उपलब्ध कराया जाए। इतना ही नहीं, कोवाक्सिन’ वैक्सीन सुरक्षित है, ऐसा डेटा उपलब्ध होने के बावजूद ‘उन्होंने ‘कोवाक्सिन’ वैक्सीन का उपयोग करने से इनकार कर दिया।

झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने भी अपने राज्य में फ्री वाक्सिन की घोषणा कर दी और बाद में प्रधानमंत्री को मुफ्त वैक्सीन की मांग की। उनके स्वास्थ्य मंत्री बन्ना गुप्ता ने भारत में टीकाकरण अभियान शुरू होने के बाद कहा कि "भारत के लोग टीकाकरण के लिए प्रयोगशाला के चूहे नहीं हैं।"

प्रारंभ में जब भारत में वैक्सीन का उत्पादन शुरू हुआ और 16 जनवरी 2021 से 'दुनिया का सबसे बड़ा टीकाकरण अभियान' शुरू किया गया। कांग्रेस के नेतृत्व में विपक्षी समूहों ने विभिन्न तरीकों से टीकाकरण अभियान को कमजोर करने की कोशिश की है,  जिसमें फ्रंट लाइन वर्कर और अन्य पुरानी बीमारियों वाले लोगों के टीकाकरण शुरुआती दिनों में शामिल थे।

टीके सुरक्षित नहीं हैं, टीकों के उचित परीक्षण के बिना इतनी जल्दी में टीकाकरण क्यों शुरू किया जा रहा है? विदेशों से टीके क्यों नहीं खरीदे जाते हैं? लोगो को स्वदेशी टीके लगाने पर जोर क्यों दे रहे हैं? सभी उम्र के लोगों के लिए टीके क्यों नहीं हैं? ऐसे कई सवाल खड़े किए गए थे। वास्तव में, विपक्ष भी जानता था कि, सरकार इस तरह से काम कर रही है जिससे यह सुनिश्चित करे की, वैज्ञानिक रूप से आवश्यक है उनका कि टीकाकरण सुचारू रूप से पहले हो और वैक्सीन की कमी भी न हो, जिससे सभी को इस कोरोना संकट से बचाया जा सके।

फिर भी जनता में भ्रम फैलाकर भय का माहौल बना दिया गया। धीरे-धीरे ये आरोप बदलने लगे कि राज्यों को टीके खरीदने या वैक्सीन कैसे बांटना है इसका अधिकार दिया जाना चाहिए। क्योंकि भारत एक 'लोकतांत्रिक' देश है, स्वास्थ्य एक राज्य का मुद्दा है, इसलिए मोदी को 'हिटलर' नहीं बनना चाहिए, हर राज्य को वैक्सीन खरीदने के लिए अपनी शक्ति का उपयोग करने दें, इसके लिए 'ग्लोबल टेंडर' जारी करने दे और इसके लिए योजना भी बनाने दे

लेकिन जब केंद्र सरकार या फिर मोदीजी  ने राज्यों को वैक्सीन खरीदने और योजना बनाने का अधिकार दिया तो वही विपक्ष और राज्य सरकार फिर से चिल्लाने लगे की, हमें केंद्र ने मदद देनी चाहिए। और फिर इन सबकी वजह से टीकाकरण में गड़बड़ हो गयी

इनमें से कई लोग वैक्सीन बनाते वक्त कह रहे थे कि वैक्सीन खराब है। लेकिन वैक्सीन बनने और टीकाकरण शुरू होने के बाद इन्हीं लोगों ने यू-टर्न लिया और कहने लगे कि वैक्सीन कब सबको फ्री में दी जाएगी?

कुछ मुख्यमंत्रियों ने तो यहां तक ​​घोषणा कर दी, 'हम मुफ्त टीके देंगे' और फिर केंद्र से हमें मुफ्त टीके देने की मांग की!

विपक्ष कई दिनों से आए दिन बचकाने आरोप लगा रहा है, फिर भी मोदी शांत रहे। लोग सवाल भी पूछ रहे थे कि मोदी क्यों नहीं बोल रहे हैं, विपक्ष को जवाब क्यों नहीं दे रहे हैं? लेकिन हम जैसे 'भक्त' कहा करते थे, 'मोदी बात नहीं कर रहे हैं, तो इसका मतलब है की,  एक दिन वह आएंगे और एक मिनट में विपक्ष की सारी मेहनत को बर्बाद कर देंगेजैसे की, नोटबंदी, , धारा 370 को निरस्त करना, सर्जिकल स्ट्राइक और लॉकडाउन के समय हुआ थाउस समय भी विपक्ष ने खूब हल्लागुल्ला किया फिर भी मोदी चुप रहे और अचानक एक दिन उन्होंने लोगों के सामने आकर अपने फैसले की घोषणा कर दी!!

और इस बार भी हुआ !!

धन्यवाद्!!

पवनWriting hand


नरेंद्र मोदी : जनतेचा विश्वास, विरोधकांच्या गळ्यातील फास!!

 

7 जून रोजी संध्याकाळी 5 वाजता जनतेसमोर येऊन पंतप्रधान नरेंद्र मोदींनी, जनतेला 18 वर्षेपासून पुढील वयोगटासाठी केंद्र सरकारतर्फे मोफत लसीकरणाची आणि यापुढील लस ही
केंद्र सरकारद्वारे उपलब्ध
करून देणार असल्याची खुशखबरी दिली आणि सोबतच विरोधकांच्या तोंडचे पाणी पळवून, त्यांच्या गळ्यातील मोदी नावाचा फास आणखी घट्ट केला.

लस निर्मितीपासून तर आतापर्यंत विरोधक कशा पद्धतीने वेळोवेळी मागणी बदलत गेले?, मोदींनी त्यांची मागणी मान्य करून त्यांना कसे उघडे पाडले?, आता पुन्हा मागणी बदलविल्यावर, लसीकरणाचा डोलारा पुन्हा आपल्या हाती घेऊन, कशापद्धतीने विरोधकांना तोंडघशी पाडले, याचा आढावा आपण या लेखामधून घेणार आहोत.

सुरुवात काँग्रेसचे माजी अध्यक्ष आणि आत्ता कागदोपत्री नसलेले पण अध्यक्षच असलेले, श्री राहुल गांधीजी यांच्यापासून करतो.

दिनांक 9 एप्रिल रोजी त्यांनी पंतप्रधान मोदी यांना लिहिलेल्या पत्रात मागणी केली की, राज्य सरकारला लस विकत घेण्याचे आणि नियोजन करण्याचे अधिकार द्यावेत, सर्वांसाठी लसीकरण खुले करावे. जेव्हा लसीकरण 30 वर्षापेक्षा जास्त लोकांसाठी खुले केले, त्यानंतर महिन्याभरात पुन्हा पत्र लिहून आरोप सुरू केले की, देशात लस पुरवठा कमी आहे.

आता खेला होबे वाल्या ममतादीदीकडे (व्हीलचेयर फेम) येतो, त्यांनी बंगाल निवडणुकीच्या आधी, 24 फेब्रुवारीला पंतप्रधानांना पत्र लिहिले आणि मागणी केली की, लस राज्याच्या फंडातून विकत घेण्याचे अधिकार हे राज्यांना द्यावे. मग मे महिन्यात यु टर्न घेतला की, केंद्र सरकारने लस विकत घेऊन त्यांच्या राज्याला आणि इतरही राज्यांना पुरवावी. यासोबतच त्यांनी, लसीकरण हे सर्वांसाठी खुले करावे, अशीही मागणी केली. जेव्हा की, त्यांनासुद्धा माहिती होतं की, लसीचे उत्पादन हे कमी आहे. पण त्यांना त्यातून बंगालच्या निवडणुकीत केंद्रावर आरोप करायचा होता की, केंद्र सरकारने लसीकरण मोहीम व्यवस्थित राबवलेली नाही, लस कमी पडत आहे.

दिल्लीचे मुख्यमंत्री श्री अरविंद केजरीवाल (टीव्ही फेम) यांनी मार्च महिन्यात मागणी केली की, त्यांना लस विकत घेण्याची आणि लस कोणत्या वयोगटाला द्यायचीहे ठरविण्याचे अधिकार देण्यात यावे. देशात लसीचे उत्पादन वाढलेले आहे त्यामुळे सर्वांना ल देण्याचे धोरण सुरू केले पाहिजे. तिथून दोन महिन्यानंतर, मे महिन्यात 18 ते 44 वयोगटाचे लसीकरण दिल्लीत थांबविले. पुन्हा नेहमीप्रमाणे त्यांनी यू टर्न घेतला आणि मागणी केली की, केंद्राने हस्तक्षेप करून आमच्या इथे लसीकरण करून द्यावे.

आपल्या महाराष्ट्राचे मुख्यमंत्री, डब्ल्यूएचओचे सल्लागार, श्री उद्धवजी ठाकरे (फेसबुक लाईव फेम) यांनी सुद्धा एप्रिल महिन्यात पंतप्रधानांना पत्र लिहिले की, 25 वर्षापेक्षा जास्त वयाच्या सर्वांना लस देण्यात यावी. त्याच्या काही दिवस आधी लसीकरण हळू होत असल्यामुळे केंद्र मंत्रालयाकडून कानपिचक्या सुद्धा मिळाल्या होत्या आणि त्यांचेच मंत्री में महिन्यात तोंडाच्या वाफा घालवत होते कीआम्ही ग्लोबल टेंडर काढून लस खरेदी करणार आहोत. आजपर्यंत तरी, त्यांनी एक लस सुद्धा खरेदी केलेली नाही. याउलट ज्या 18 ते 44 वयोगटासाठी लसीकरण खुले करावे म्हणून मागणी करत होते, त्यांचेसुद्धा लसीकरण महाराष्ट्रात थांबवलेले आहे.

लुटीयन्स पत्रकारांद्वारे डोक्यावर घेतलेले  केरला मॉडेल राबविणारे, केरळचे कम्युनिस्ट पक्षाचे मुख्यमंत्री पिनरायी विजयन यांनी सुरुवातीला घोषणा केली की, जे लोक लस घेण्यास पात्र आहेत, त्या सर्वांना आम्ही मोफत लस देऊ आणि नंतर पंतप्रधानांना मागणी केली की, केंद्राने पैसे भरून, लस सर्वांसाठी मोफत उपलब्ध करून द्यावी. पण क्रेडीट त्यांना स्वतःला पाहिजे होतं म्हणून त्यांनी आधी घोषणा करून टाकली. इतके असूनही त्यांनी कोव्हाक्सिन लसीऐवजी फक्त कोविशिल्ड लस वापरण्यास प्रथम प्राधान्य दिले. ही वास्तविकता आहे केरला मॉडेल ची.

उत्तरप्रदेशचे माजी मुख्यमंत्री अखिलेश यादव, ज्यांनी या लसीला बीजेपी वॅक्सिन असे नामकरण केले होते. नंतर तेच मागणी करू लागले की, सरकारने लोकांना सांगावे की सर्वांना लस कधी मिळेल’?.त्यानंतर लवकरच ते मोफत लस कधी मिळेल आणि लस कमी पडत आहे, या टूलकिट मध्ये सामील सुद्धा झाले.

या सर्वांना माहिती होतं की, सरकार का बरं टप्प्याटप्प्याने, वयोगटानुसार लसीकरणाचा कार्यक्रम राबवत आहे. कारण, लसीचे उत्पादन त्यासोबतच वैज्ञानिकदृष्ट्या महत्त्वाच्या असलेल्या लोकांचे लसीकरण या दोन्हींचा ताळमेळ केंद्र सरकार लावत होते. पण तरीही राजकीय आकसापोटी वारंवार सर्वांसाठी लसीकरण खुले करावे म्हणून मागणी केली गेली. जेणेकरून लस पुरवठा कमी दिसायला लागल्यावर त्यावर राजकीय आरोप करता येतील. मग जेव्हा लसीकरणाचे अधिकार राज्याकडे दिले गेले, तेव्हा त्याचा बट्ट्याबोळ केला.

मोदींनी पण मोठ्या खुबीने त्यांच्याकडे लसीकरणाचे सर्व अधिकार दिले आणि त्यांना उघडे पाडले. आता जनतेसमोर सत्य हे सूर्यप्रकाशासारखे स्पष्ट आहे की, विरोधक हे फक्त राजकारण करीत होते आणि त्यांना काम करणे जमलेले नाही. त्याउलट मोदी हे फक्त शांतपणे आपले काम करून जनतेप्रती आपली जबाबदारी पार पडत होते. यातून मोदींवर असलेला जनतेचा विश्वास आणखी दृढ झाला आणि विरोधकांच्या गळ्यातील मोदी नावाचा फास हा आणखी घट्ट झाला.

यासोबतच अनेक राज्यांचे मुख्यमंत्री, मंत्री आणि बडे काँग्रेस नेते यांनी सुद्धा अशाचप्रकारे आपली मागणी वेळोवेळी बदललेली आहे. त्यामध्ये श्रीमती सोनिया गांधी, प्रियंका गांधी, आनंद शर्मा, शशी थरूर, पी चिदम्बरम, अभिषेक मनू सिंघवी, जयराम रमेश, मनीष तिवारी, रणदीप सुरजेवाला, हे काँग्रेस नेते आणि सोबतच अशोक गहलो, भुपेश बघेल, हेमंत सोरेन, कॅप्टन अमरिंदरसिंग यांच्यासारखे मुख्यमंत्रीसुद्धा होते. 

डिसेंबर 2020 च्या सुरुवातीला काँग्रेसमधील अनेक बडे नेते हे, सर्व चाचण्या यशस्वीरित्या पूर्ण करून बनलेल्या लसींचा वापर करून, भारतातील सुरू होणार्‍या लसीकरणाच्या प्रक्रियेवर शंका-कुशंका निर्माण करत होते. त्या यादीमध्ये जयराम रमेश, शशी थरूर, मनीष तिवारी, आनंद शर्मा होते. इतकेच नव्हे तर काँग्रेसचे प्रवक्ते रणदीप सुरजेवाला यांनी तर पत्रकार परिषद घेऊन, कोरोना लसीच्या कार्यक्षमतेवर आणि होणार्‍या साईड इफेक्टवर प्रश्नचिन्ह लावले. तसेच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आरोग्यमंत्री तसेच मंत्रिमंडळातील इतर मंत्री आणि सर्व मुख्यमंत्री हे सर्वात आधी लस का घेत नाहीत? असाही प्रश्न उभा करून, जनतेच्या मनात शंका निर्माण केली.

श्रीमती सोनिया गांधी बोलल्या की, मला माहिती आहे लस कमी आहे. तरीसुद्धा सरकारने 25 वर्षेपेक्षा जास्त असलेल्या वयोगटाची लसीकरण करण्याची मागणी केली. यासोबतच त्यांनी आरोप केला की, केंद्र हे राज्याची दडपशाही करतेय, इतकेच नव्हे तर त्यांनी जानेवारी 2021 मध्ये काँग्रेस वर्किंग कमिटीच्या बैठकीत मस्त भाषण दिले होते की, लस वाया घालवू नये. परंतु शोकांतिका ही आहे की, त्यांचीच सत्ता असलेल्या राज्यांमध्ये सर्वात जास्त लस ही वाया घालवण्यात आलेली आहे. उदाहरणार्थ राजस्थान, झारखंड, छत्तीसगड.

काँग्रेसच्या जनरल सेक्रेटरी प्रियंका गांधीनी,  12 एप्रिल रोजी पासून 'स्पीक अप फ़ॉर वैक्सिन' या कैम्पेनच्या माध्यमातून सर्वांसाठी लसीकरण सुरू करावे, म्हणून लोकांना आवाज उठवण्याची विनंती केली आणि लस कमी पडल्यानंतर त्याच्यावर बोंबाबोंब ठोकायला सुरू झाल्या.

आनंद शर्मा यांच्या नेतृत्वात सर्व विरोधी पक्षांनी मागणी केली की, भारत हा एक संघराज्य पद्धती असलेला देश आहे. त्यानुसार आरोग्य हा राज्याचा विषय आहे आणि सध्या जरी आपत्ती आलेली असली तरी राज्यांना लस विकत घेण्याचे अधिकार द्यावेत. केंद्र सरकारने त्याला कंट्रोल करू नये, कारण ते संविधानिक ठरत नाही. परंतु ज्यावेळी राज्यांना अधिकार केंद्र सरकारद्वारे परत दिले गेले.

काँग्रेस नेते शशी थरुर यांनी, आधी  'वॅक्सिन मैत्री मिशनच्या' माध्यमातून होत असलेल्या निर्यातीची निंदा केली आणि नंतर निर्यात थांबवली, तेव्हा म्हणायला लागले की, निर्यात बंद का केली ?

शशी थरूर आणि अभिषेक मनु सिंघवी या दोघांनी ही मागणी केली की, लस ही मुक्त बाजारपेठेत जास्त भावाने विक्रीला ठेवावी. नंतर यु टर्न घेऊन म्हणायला लागले की, लसीची किंमत वेगवेगळी का? आणि लस सगळ्यांना मोफत मिळायला पाहिजे.

माजी केंद्रीय मंत्री आणि काँग्रेस नेते पी चिदंबरम यांनी सुद्धा आधी सर्वांसाठी लसीकरण खुले करावे म्हणून मागणी केली आणि ते खुले केल्यानंतर लस कमी पडत आहे म्हणून बोंब ठोकायला सुरुवात केली. जर लस कमी आहे, हे माहिती आहे तर मग उगाच मागणी का बरं केली?

काँग्रेसचेच राजस्थानचे मुख्यमंत्री श्री अशोक गहलोत यांनी एप्रिल महिन्यात केंद्र सरकारला विनंती केली की, सर्वांसाठी लसीकरण खुले करावे, वयाची अट असू नये आणि यु टर्न घेऊन 26 एप्रिल रोजी  केंद्रीय आरोग्यमंत्री यांना तक्रार करायला लागले की, लस उपलब्धता कमी आहे.

काँग्रेस एकीकडे विचारत होती की, मोदीजी हमारे बच्चो की वैक्सिन विदेश क्यो भेज दी? आणि दुसरीकडे उपलब्ध असलेली लस ही वाया घालवत होती. याचप्रमाणे आधी मागणी केली की, लस निर्यात करू नका, लस निर्यात थांबवल्यावर म्हणायला लागले की, लस निर्यात का थांबवली?

छत्तीसगडचे मुख्यमंत्री भूपेश बघेल यांनीसुद्धा एप्रिल महिन्यात पत्र लिहून पंतप्रधानाना मागणी केली की, 18 पेक्षा जास्त वय असलेल्या सर्वांचे लसीकरण खुले करावे आणि खुले केल्यानंतर, 18 ते 44 मधील ज्या लोकांनी ऑनलाईन नोंदणी करून लस केंद्रावर गर्दी केली आणि लस उपलब्ध नसल्यामुळे गोंधळ घातला, त्यासाठी नाराजी सुद्धा व्यक्त केली. छत्तीसगडचे आरोग्यमंत्री टी एस सिंहदेव हे आधी स्वदेशी लस सुरक्षित आहे किंवा नाही? असे म्हणून लोकांमध्ये भीती निर्माण करत होते. ते इतक्यावरच थांबले नाही तर त्यांनी  कोव्हाक्सिन लस सुरक्षित नाही, असे म्हणून छत्तीसगडमध्ये तिचा वापर सुद्धा थांबवला. लोकांमध्ये भीती पसरल्यानंतर त्यांनी स्वतः तीच लस स्वतःला टोचून घेतली!

पंजाबचे मुख्यमंत्री कॅप्टन अमरिंदरसिंग यांनीही एप्रिल महिन्यात केंद्र सरकारला मागणी केली की, लसीकरण सर्वांसाठी खुले करावे. परंतु त्याच्याच काही आठवडे आधी पंजाब सरकारला चेतावणी देण्यात आली की, त्यांच्याकडे लसीकरणाचे प्रमाण हे खूप हळू आहे. मग यावरून लक्षात घ्या की, ज्याठिकाणी उपलब्ध असलेली लस व्यवस्थित वापरून लसीकरण करता येत नाही, ते राज्य मागणी करते की, आणखी लोकांसाठी लस खुली करा. इतकेच नव्हे तर त्यांनी कोव्हाक्सिन लस वापरण्यास नकार दिला, ही लस सुरक्षित असल्याचा डाटा उपलब्ध असूनही.

झारखंडचे मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन यांनी सुद्धा त्यांचाच कित्ता गिरवला आणि सुरुवातीला घोषणा करून नंतर पंतप्रधानांकडे मोफत लसीची मागणी केली. त्यांचेच आरोग्यमंत्री श्री बन्ना गुप्ता यांनी भारतात लसीकरण सुरू झाल्यानंतर वक्तव्य केले की, भारतातील जनता ही लस परिक्षणासाठी लॅबमधील उंदीर नाहीत.

सुरुवातीला जेव्हा भारतात लस निर्मिती सुरू झाली आणि 16 जानेवारीपासून 2021 पासून 'जगातली सर्वात मोठी लसीकरण मोहीम' राबविणे सुरू केले गेले. ज्यामध्ये प्रामुख्याने सुरुवातीला फ्रन्टलाइन वर्कर आणि इतर दुर्धर आजार असलेल्या लोकांचे लसीकरण सुरू झाले, त्याही आधीपासून काँग्रेसच्या मार्गदर्शनात विरोधकांनी विविध प्रकारे या लसीकरण मोहिमेला सुरुंग लावण्याचा प्रयत्न केला.

यामध्ये प्रामुख्याने लस सुरक्षित नाही, इतक्या घाईघाईत लसीची चांगल्या प्रकारे चाचणी न करता लसीकरण का सुरु केले जात आहे?, विदेशातील लस का विकत घेत नाहीत?, स्वदेशी लस घेण्यासाठीच हट्ट का?, सर्व वयोगटातील लोकांना लस का नाही?, असे एक ना अनेक प्रश्न उभे केले गेले. वस्तुतः विरोधकानाही माहिती होतं की, वैज्ञानिकदृष्ट्या जे जरुरी आहे, त्यापद्धतीने सरकार काम करते आहे, जेणेकरून लसीकरण सुरळीत पार पाडून, या कोरोनाच्या संकटातून सर्वांना बाहेर काढता येईल.

तरीसुद्धा जनतेमध्ये भ्रम पसरवून भीतीचे वातावरण निर्माण करण्यात आले. नंतर हळूहळू आरोप बदलायला लागले की, लस विकत घेण्याचे किंवा लसीचे नियोजन करण्याचे अधिकार हे राज्यांना द्यायला पाहिजे. कारण भारत हा 'लोकशाही' असलेला देश आहे, आरोग्य हा राज्याचा विषय आहे, त्यामुळे मोदींनी 'हिटलर' न बनता, प्रत्येक राज्याला आपले-आपले अधिकार वापरून लस विकत घेऊ द्यावी, त्यासाठी ग्लोबल टेंडर सुद्धा काढू द्यावे आणि त्याचे नियोजन सुद्धा त्यांनाच करू द्यावे, अशी आवई उठवली गेली.

परंतु जेव्हा मोदींनी म्हणजेच केंद्र सरकारने लस विकत घेण्याचे आणि नियोजनाचे अधिकार राज्यांना दिले तर त्यानंतर हेच विरोधी पक्ष आणि राज्य सरकार पुन्हा ओरडायला लागले. आम्हाला केंद्राने मदत करायला पाहिजे, त्यातून मग लसीकरणाचा प्रत्येक ठिकाणी बोजवारा उडाला.

यातील बरेच लोक असे होते जे लस निर्मिती होत असताना म्हणत होते की, ही लस खराब आहे. पण लस निर्मिती झाल्यानंतर आणि लसीकरण सुरू झाल्यानंतर हेच लोक यु टर्न घेऊन म्हणायला लागले की, लस मोफत कधी देणा?

काही मुख्यमंत्री तर असे होते की, आम्ही मोफत लस देणार म्हणून घोषणा केली आणि त्यानंतर केंद्राला मागणी केली की, आम्हाला फुकट लस द्या!

असे एक न अनेक आरोप बर्‍याच दिवसापासून विरोधक रोज बालिशपणे करीत होते, तरीही मोदी शांत होते. जनतासुद्धा प्रश्न विचारायला लागली होती की, मोदी बोलत का नाहीत, विरोधकांना उत्तर का देत नाहीत? पण आमच्यासारखे भक्त यावर सांगायचे की, मोदी बोलत नाहीत, म्हणजे समजून जायचे की, एकदिवस येतील आणि विरोधकांची इतक्या दिवसाची मेहनत एका मिनिटात पाण्यात घालतील. याचे उदाहरण नोटबंदी, कलम 370 रद्द करणे, सर्जिकल स्ट्राईक, आणि लॉकडाऊन. या सर्व वेळी विरोधकांनी खूप आरडा-ओरडा केलेला आणि मोदी शांतच होते, अचानक एकदिवस जनतेसमोर आले आणि आपला निर्णय जाहीर करून मोकळे झाले.

आणि यावेळीही तसेच झाले!!

धन्यवाद!!!

पवनWriting hand


भारत 1989-2014 आणि नंतर - आमुलाग्र बदल!!

रविवार विशेष!! आजचा लेख जरा जास्तच मोठा आहे. पण भारताचा भूतकाळ, वर्तमानकाळ आणि भविष्यकाळ समजून घ्यायचा असेल, तर आवर्जून वाचाच. भारतात नेहमीच...