7 जून को शाम 5 बजे लोगों के सामने आकर, प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने घोषणा कर दी की, केंद्र सरकार 18 साल और उससे आगे बड़े आयु वर्ग के लिए मुफ्त टीकाकरण प्रदान करेगी, इससे जनता में ख़ुशी की लहर आ गयी और विपक्ष के पसीने छुट गए और साथ ही साथ उनके गले में ‘मोदी’ नाम का फंदा और भी पक्का हो गया.
इस लेख में, हम देखेंगे कि वैक्सीन निर्माणकार्य शुरू होने के बाद से विपक्ष ने समय-समय पर अपनी मांगों को कैसे बदला है, मोदी ने उनकी मांगों को कैसे स्वीकार किया और उन्हें बेनकाब किया? अब जब विपक्ष ने मांग फिर से बदल दी है, तो उन्होंने टीकाकरण की कमान को फिरसे अपने हाथ में ले लिया है।
इसकी शुरुआत कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष और अब भी बिना पद लिए अध्यक्ष की कमान संभल रहे, श्री राहुल गांधी जी से ही करते है।
9 अप्रैल को प्रधानमंत्री मोदी को लिखे एक पत्र में उन्होंने मांग की, कि राज्य सरकार को टीके खरीदने और योजना बनाने की इजाजत दी जाए और टीकाकरण सभी को उपलब्ध कराया जाए। जब 30 से अधिक उम्र के लोगों के लिए टीकाकरण खोला गया, तो उन्होंने एक महीने के भीतर फिर से फिर एक पत्र लिखा, जिसमें आरोप लगाया कि, देश में वैक्सीन की आपूर्ति कम है।
अब 'खेला होबे' वाली ममता बनर्जी (व्हीलचेयर फेम) की बात करते है, उन्होंने बंगाल चुनाव से पहले 24 फरवरी को प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर मांग की थी कि, राज्यों को, राज्य के फंड से, वैक्सीन खरीदने का अधिकार दिया जाए। फिर मई में यू-टर्न लिया और मांग कि, की केंद्र सरकार वैक्सीन खरीदकर उनके राज्य और दूसरे राज्यों को भी सप्लाई करे. उन्होंने यह भी मांग की, कि टीकाकरण को सार्वजनिक किया जाए। हालांकि, वे यह भी जानती थी कि वैक्सीन का उत्पादन कम है। लेकिन वह बंगाल चुनाव में केंद्र पर आरोप लगाना चाहती थी, कि केंद्र सरकार ने टीकाकरण अभियान ठीक से नहीं चलाया, वैक्सीन कम पड़ रही है।
मार्च में, दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल (टीवी फेम) ने मांग की, कि उन्हें वैक्सीन खरीदकर किस आयु वर्ग को दें? इसे निर्णय लेने का अधिकार होना चाहिए। देश में टीकों का उत्पादन बढ़ा है, इसलिए सभी के लिए टीकाकरण की नीति अपनाई जानी चाहिए। दो महीने बाद, मई में, दिल्ली में 18 से 44 साल के बच्चों के लिए टीकाकरण बंद कर दिया गया। फिर से, हमेशा की तरह, उन्होंने यू-टर्न लिया और केंद्र से हस्तक्षेप करने और टीका लगवाने की मांग की।
हमारे महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री, डब्ल्यूएचओ के सलाहकार, श्री उद्धवजी ठाकरे (फेसबुक लाइव फेम) ने भी अप्रैल में प्रधानमंत्री को एक पत्र लिखा, जिसमें आग्रह किया गया कि, 25 वर्ष से अधिक उम्र के सभी लोगों को टीका लगाया जाना चाहिए। इससे कुछ दिन पहले ही, उन्हें केंद्रीय मंत्रालय डांट मिली थी कि, टीकाकरण धीमा हो रहा है और उनके अपने मंत्री मई में कह रहे थे, कि हम एक 'वैश्विक निविदा' के माध्यम से वैक्सीन की खरीद करेंगे। हालांकि, आज तक, उन्होंने एक भी टीका नहीं खरीदा है। दूसरी ओर, महाराष्ट्र में 18 से 44 वर्ष के बीच के उन लोगों के लिए भी टीकाकरण रोक दिया गया है, जिनके टीकाकरण की वह मांग कर रहे थे।
केरल के कमुनिस्ट पार्टी के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन, जो लुटियंस पत्रकारों द्वारा उठाये गए 'केरल मॉडल' को लागू कर रहे हैं, उन्होंने शुरू में घोषणा की, कि हम उन सभी को मुफ्त टीके उपलब्ध कराएंगे जो टीकाकरण के पात्र आयु वर्ग में आते हैं और फिर प्रधानमंत्री से मांग की, कि वैक्सीन फ्री में उपलब्ध कराया जाए। सबको मुफ्त देंगे की घोषणा उन्होंने की, क्योंकि वे क्रेडिट खुद लेना चाहते थे। इसके बावजूद, उन्होंने ‘कोवाक्सिन’ वैक्सीन के बजाय केवल ‘कोविशील्ड’ वैक्सीन का उपयोग करना पसंद किया। ये है ‘केरल मॉडल’ की हकीकत।
उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव, जिन्होंने वैक्सीन को 'बीजेपी वैक्सीन' करार दिया था। बाद में उन्होंने मांग की कि सरकार लोगों को बताए, "सभी को टीका कब मिलेगा?"
उन सभी को पता था कि सरकार वैज्ञानिक तरीके से, आयु-आधारित टीकाकरण कार्यक्रम क्यों लागू कर रही है। ऐसा इसलिए था, क्योंकि केंद्र सरकार ‘टीकों के उत्पादन के साथ-साथ अत्यावश्यक लोगों के टीकाकरण’ ऐसी दोनों चीजो का समन्वय कर रही थी। हालांकि, राजनीतिक विपक्षियो ने बार-बार टीकाकरण को सभी के लिए खुला रखने का आह्वान किया है। ताकि टीकों की आपूर्ति कम होने पर सरकार पर राजनीतिक आरोप लगाए जा सकें। फिर जब राज्य को टीकाकरण का अधिकार दिया गया तो उसमे सब गड़बड़ कर दिया गया।
लेकिन मोदी ने कुशलता से उन्हें टीकाकरण के अधिकार दिए और उनका पर्दाफाश किया। अब लोगों के सामने यह सच सूरज की तरह साफ है कि, विपक्ष सिर्फ राजनीति कर रहा था और काम करने को तैयार नहीं है। इसके उलट मोदी बस चुपचाप अपना काम कर रहे थे और लोगों के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभा रहे थे। इससे लोगों का मोदी पर विश्वास और मजबूत हुआ साथ ही ‘मोदी’ नाम का फंदा विपक्ष के गले में और कस गया।
इसके अलावा, कई राज्य के मुख्यमंत्रियों, मंत्रियों और कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने समय-समय पर अपनी मांगों को बदला है। इनमें सोनिया गांधी, प्रियंका गांधी, आनंद शर्मा, शशि थरूर, पी चिदंबरम, अभिषेक मनु सिंघवी, जयराम रमेश, मनीष तिवारी, रणदीप सुरजेवाला, कांग्रेस नेताओं के साथ-साथ अशोक गहलोत, भूपेश बघेल, हेमंत सोरेन और कैप्टन अमरिंदर जैसे मुख्यमंत्री भी शामिल थे।
दिसंबर 2020 की
शुरुआत में कांग्रेस के कई बड़े नेताओं ने, सफलतापूर्वक परीक्षण पूर्ण किए गए टीकों
का उपयोग भारत में टीकाकरण के लिए की जानेवाली प्रक्रिया के बारे में संदेह पैदा करने
का काम किया था। इस सूची में जयराम रमेश, शशि थरूर, मनीष
तिवारी और आनंद शर्मा शामिल थे। इतना ही नहीं कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला
ने प्रेस कांफ्रेंस करते हुए कोरोना वैक्सीन की प्रभावशीलता और संभावित
दुष्प्रभावों पर सवाल उठाया। साथ ही, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, स्वास्थ्य मंत्री और अन्य कैबिनेट मंत्रियों और सभी मुख्यमंत्रियों
को पहले टीका क्यों नहीं लगवाते?
ऐसा सवाल उठाकर उन्होंने लोगों के मन में शंका पैदा कर दी।
श्रीमती सोनिया गांधी ने कहा, "मुझे पता
है कि टीका कम है, फिर भी, सरकार
से 25 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों के लिए टीकाकरण खुला करने की मांग करती हू।" उन्होंने
यह भी आरोप लगाया कि केंद्र राज्यों पर तानाशाही कर रहा है, उन्होंने जनवरी
2021 में कांग्रेस कार्य समिति की बैठक में एक मजबूत भाषण दिया था, जिसमें कहा गया
था, "टीके
बर्बाद नहीं होने चाहिए।" लेकिन त्रासदी यह है कि, उनके नियंत्रण वाले
राज्यों में अधिकांश टीके बर्बाद हो चुके हैं। उदाहरण के लिए राजस्थान, झारखंड, छत्तीसगढ़।
कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने 12 अप्रैल
से 'स्पीक अप
फॉर वैक्सीन' अभियान
के माध्यम से सभी के लिए टीकाकरण शुरू करने के लिए लोगों से आवाज उठाने का आग्रह
किया और टीका समाप्त होने के बाद इस पर हल्लागुल्ला शुरू कर दिया।
आनंद शर्मा के नेतृत्व में सभी विपक्षी दलों ने
मांग की, कि भारत एक 'संघीय
व्यवस्था' वाला
देश है। उसके अनुसार, 'स्वास्थ्य' राज्य का मुद्दा
है और आपदा आने पर भी राज्यों को टीके खरीदने का अधिकार दिया जाना चाहिए। केंद्र
सरकार को इसे नियंत्रित नहीं करना चाहिए, क्योंकि यह संवैधानिक नहीं है। लेकिन जब केंद्र सरकारने राज्यों को अधिकार
वापस कर दिए, तब पुरे टीकाकरण कार्यक्रम की बैंड बजा दी गयी।
कांग्रेस नेता शशि थरूर ने पहले 'वैक्सीन
फ्रेंडशिप मिशन' के
जरिए निर्यात की निंदा की और फिर निर्यात बंद कर दिया, तो वे कहने लगे, निर्यात क्यों
बंद कर दी?
शशि थरूर और अभिषेक मनु सिंघवी दोनों ने मांग
की, कि खुले बाजार में वैक्सीन को अधिक कीमत पर बेचा जाना चाहिए। फिर उन्होंने
यू-टर्न लेते हुए कहा, 'वैक्सीन
की कीमत अलग क्यों है? और
सभी को मुफ्त में वैक्सीन मिलनी चाहिए।'
पूर्व केंद्रीय मंत्री और कांग्रेस नेता पी
चिदंबरम ने पहले 'सभी
के लिए टीकाकरण' का
आह्वान किया था और 'वैक्सीन
की कमी' के साथ शोर
मचाना शुरू कर दिया। अगर वैक्सीन की सप्लाई कम है तो सबको देने की डिमांड क्यों?
अप्रैल में, राजस्थान कांग्रेस के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने केंद्र से सभी के
लिए टीकाकरण खोलने, उम्र
की सीमा न रखने की बात कही और यू-टर्न लेकर 26 अप्रैल को केंद्रीय स्वास्थ्य
मंत्री से शिकायत कि, की वैक्सीन की उपलब्धता कम है।
एक तरफ कांग्रेस पूछ रही थी कि, मोदीजी ने
हमारे बच्चों की वैक्सीन विदेश क्यों भेजी? वहीं दूसरी ओर उपलब्ध वैक्सीन बर्बाद की जा रही थी। इसी तरह पहले
टीकों का निर्यात न करने की मांग की, वैक्सीन का निर्यात रोकने के बाद कहने लगे कि वैक्सीन का निर्यात
क्यों बंद कर दिया?
छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने भी
अप्रैल में प्रधानमंत्री को एक पत्र लिखकर मांग की थी कि, 18 वर्ष से अधिक आयु के
सभी लोगों के लिए टीकाकरण खोला जाए,
और यह खुला करने के बाद, 18 से 44 वर्ष के बीच के लोगोने ,जिन्होंने ऑनलाइन पंजीकरण किया और
टीकाकरण में भीड़ लगाई तब उन्होंने ही परेशानी व्यक्त की। छत्तीसगढ़ के स्वास्थ्य
मंत्री टीएस सिंहदेव पहले स्वदेशी वैक्सीन सुरक्षित हैं या नहीं? ऐसा लोगों में
डर पैदा कर रहे थे। वह इसपर ही नहीं रुके, बल्कि उन्होंने छत्तीसगढ़ में ‘कोवासिन’ वैक्सीन का उपयोग करना भी
बंद कर दिया, यह
कहते हुए कि यह सुरक्षित नहीं है। लोगों में डर फैलाने के बाद उन्होंने खुद को उसी
वैक्सीन का इंजेक्शन लगवाया!
पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने
भी अप्रैल में केंद्र से सभी के लिए टीकाकरण शुरू करने की मांग की थी। लेकिन उसके कुछ
हफ्ते पहले ही पंजाब सरकार को चेतावनी दी गई थी कि, टीकाकरण की दर बहुत धीमी है। तो
ध्यान दीजिये कि, जहां टीकों का ठीक से उपयोग नहीं किया जा सकता है, वहां राज्य मांग
करता है कि टीका अधिक लोगों को उपलब्ध कराया जाए। इतना ही नहीं, कोवाक्सिन’ वैक्सीन
सुरक्षित है,
ऐसा डेटा उपलब्ध होने के बावजूद ‘उन्होंने ‘कोवाक्सिन’ वैक्सीन का उपयोग करने से
इनकार कर दिया।
झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने भी अपने
राज्य में फ्री वाक्सिन की घोषणा कर दी और बाद में प्रधानमंत्री को मुफ्त वैक्सीन
की मांग की। उनके स्वास्थ्य मंत्री बन्ना गुप्ता ने भारत में टीकाकरण अभियान शुरू
होने के बाद कहा कि "भारत के लोग टीकाकरण के लिए प्रयोगशाला के चूहे नहीं
हैं।"
प्रारंभ में जब भारत में वैक्सीन का उत्पादन
शुरू हुआ और 16 जनवरी 2021 से 'दुनिया
का सबसे बड़ा टीकाकरण अभियान' शुरू
किया गया। कांग्रेस के नेतृत्व में विपक्षी समूहों ने विभिन्न तरीकों से टीकाकरण
अभियान को कमजोर करने की कोशिश की है, जिसमें फ्रंट लाइन वर्कर और अन्य
पुरानी बीमारियों वाले लोगों के टीकाकरण शुरुआती दिनों में शामिल थे।
टीके सुरक्षित नहीं हैं, टीकों के उचित
परीक्षण के बिना इतनी जल्दी में टीकाकरण क्यों शुरू किया जा रहा है? विदेशों से टीके
क्यों नहीं खरीदे जाते हैं? लोगो
को स्वदेशी टीके लगाने पर जोर क्यों दे रहे हैं? सभी उम्र के लोगों के लिए टीके क्यों नहीं हैं? ऐसे कई सवाल खड़े किए
गए थे। वास्तव में, विपक्ष
भी जानता था कि, सरकार इस तरह से काम कर रही है जिससे यह सुनिश्चित करे की, वैज्ञानिक
रूप से आवश्यक है उनका कि टीकाकरण सुचारू रूप से पहले हो और वैक्सीन की कमी भी न
हो, जिससे सभी को इस कोरोना संकट से बचाया जा सके।
फिर भी जनता में भ्रम
फैलाकर भय का माहौल बना दिया गया। धीरे-धीरे ये आरोप बदलने लगे कि राज्यों को टीके
खरीदने या वैक्सीन कैसे बांटना है इसका अधिकार दिया जाना चाहिए। क्योंकि भारत एक 'लोकतांत्रिक' देश है, स्वास्थ्य एक
राज्य का मुद्दा है, इसलिए मोदी को 'हिटलर' नहीं बनना चाहिए, हर राज्य को वैक्सीन खरीदने के लिए अपनी शक्ति
का उपयोग करने दें, इसके लिए 'ग्लोबल टेंडर' जारी करने दे और इसके लिए योजना भी बनाने दे।
लेकिन जब केंद्र सरकार या
फिर मोदीजी ने राज्यों को
वैक्सीन खरीदने और योजना बनाने का अधिकार दिया तो वही विपक्ष और राज्य सरकार फिर
से चिल्लाने लगे की, हमें केंद्र ने मदद देनी चाहिए। और फिर इन सबकी वजह से टीकाकरण में गड़बड़ हो गयी।
इनमें से कई लोग वैक्सीन
बनाते वक्त कह रहे थे कि वैक्सीन खराब है। लेकिन वैक्सीन बनने और टीकाकरण शुरू
होने के बाद इन्हीं लोगों ने यू-टर्न लिया और कहने लगे कि वैक्सीन कब सबको
फ्री में दी जाएगी?
कुछ मुख्यमंत्रियों ने तो
यहां तक घोषणा कर दी, 'हम मुफ्त टीके देंगे' और फिर केंद्र से हमें मुफ्त टीके देने की मांग
की!
विपक्ष कई दिनों से आए दिन बचकाने आरोप लगा रहा है, फिर भी मोदी शांत रहे। लोग सवाल भी पूछ रहे थे कि मोदी क्यों नहीं बोल रहे हैं, विपक्ष को जवाब क्यों नहीं दे रहे हैं? लेकिन हम जैसे 'भक्त' कहा करते थे, 'मोदी बात नहीं कर रहे हैं, तो इसका मतलब है की, एक दिन वह आएंगे और एक मिनट में विपक्ष की सारी मेहनत को बर्बाद कर देंगे। जैसे की, नोटबंदी, , धारा 370 को निरस्त करना, सर्जिकल स्ट्राइक और लॉकडाउन के समय हुआ था। उस समय भी विपक्ष ने खूब हल्लागुल्ला किया फिर भी मोदी चुप रहे और अचानक एक दिन उन्होंने लोगों के सामने आकर अपने फैसले की घोषणा कर दी!!
और इस बार भी हुआ !!
धन्यवाद्!!
पवन