पिछले हफ्ते अमेरिका ने कोवाक्सिन को रिजेक्ट किया, ऐसी खबरें मराठी मीडिया के साथ-साथ हिंदी और अंग्रेजी मीडिया में भी गर्म रही थीं।
लेकिन क्या वाकई ऐसा हुआ है? या फिर यह मीडियाद्वारा खड़ा किया गया एक धोखा है? यह जानने के लिए इस लेख को जरुर पढ़ें।
भारत की कंपनी 'भारत बायोटेक' की, अमेरिकी भागीदार ऑक्यूजेन ईयूए (एमेर्जंसी युज ऑफ औथोरायझेशन) के अनुमति के लिए यूएसएफडीए में आवेदन और वैक्सीन के बारे में सभी जानकारी प्रस्तुत करने की प्रक्रिया में थी। उसके पहले ही यूएसएफडीए द्वारा ईयूए के बजाय बीएलए (बायोलोजीस्टिक्स सायसन्स अप्लीकेशन) अनुमति के लिए आवेदन और सभी दस्तावेज जमा करने के लिए कहा गया।
ईयूए क्या है? चलिए देखते हैं।
ईयूए के लिए, यूएसएफडीए किसी आपात स्थिति में अस्वीकृत चिकित्सा उत्पादों के उपयोग की अनुमति दे सकता है, जब कुछ वैधानिक मानदंडों को पूरा किया जाता है, साथ ही पर्याप्त, स्वीकृत और उपलब्ध विकल्प नहीं होते हैं। जैसा कि वर्तमान कोविड -19 आपातकाल के मामले में था।
निर्माता तय करता है कि एफडीए के पास ईयूए अनुरोध कैसे और कब जमा करना है। एक बार सबमिट करने के बाद, यूएसएफडीए की तरफ से ईयूए अनुरोध की जाँच पड़ताल और मूल्यांकन करता है, और एफडीए को उपलब्ध कराए गए टीके के सभी वैज्ञानिक प्रमाणों को ध्यान में रखते हुए, प्रासंगिक वैधानिक मानदंड पूरे होते हैं या नहीं? यह निर्धारित करता है।
हालाँकि, कोवाक्सिन के केस में ऐसा कुछ भी नहीं हुआ है। ईयूए परमिट के लिए आवश्यक सभी शोध और परीक्षण सौंपे जाने से पहले ही , यूएस ड्रग कंट्रोलर ने ऑक्यूजेन को सुझाव दिया कि आप ईयूए की अनुमति के लिए आवेदन किए बिना बीएलए के लिए आवेदन करें।
इसका कारण, उन्होंने बताया की,, "अब जबकि उनके देश में आपातकालीन स्थिति नियंत्रण में है, इस वजह से नया ईयूए अब जारी नहीं किया जाएगा।"
ईयूए, क्या भारत की कोवासिन को खराब कहकर खारिज कर दिया गया था? तो इसका उत्तर "नहीं" है।
यदि सभी दस्तावेज यूएसएफडीए को जमा कर दिए गए होते और जांच के बाद उन्हें खारिज कर दिया गया होता, तो कोवाक्सिन को खराब कहा जा सकता था।
इसके अलावा, अगर कोवाक्सिन खराब होता, तो उसे 14 अन्य देशों में ईयूए नहीं दिया जाता, और अन्य 50 देशों में ईयूए प्रक्रिया शुरू नहीं होती।
इसके अलावा 12 जून को, भारत बायोटेक ने एक बयान जारी करके कहा कि वह जुलाई में अपने चरण 3 का डेटा जनता के लिए जारी करेगा और पहले के सभी डेटा पहले ही प्रकाशित हो चुके है।
बीएलए प्रक्रिया के जरिए अनुमति लेने से कौन से नुकसान है?
अब कंपनी को अपने शोध का और ब्यौरा देना होगा, जो ईयूए में नहीं करना पड़ता था। उदाहरण के लिए, पूर्व-नैदानिक परीक्षणों, नैदानिक परीक्षणों और निर्माण प्रक्रियाओं की यूएसएफडीए को जानकारी देनी पड़ेगी। इसके अलावा ईयूए में अनुमति जल्दी मिल जाती, लेकिन बीएलए में अनुमति मिलने में 8-10 महीने लग सकते है। इस वजह से और एक नुकसान होगा की कंपनी के टीकों की बिक्री में कमी होगी और साथ ही अगर ईयूए मिल गया होता, तो विश्व के बाकि देशो में कंपनी की साख और अच्छी बन जाती जिससे वहापर आसानी से कारोबार बढ़ सकता था।
यूएसएफडीए ने 11 दिसंबर 2020 को फाइजर के लिए, 18 दिसंबर 2020 को मॉडर्ना और 27 फरवरी को जॉनसन एंड जॉनसन को ईयूए मंजूरी दी और 14 जून 2021 तक इन तीन टीकों के माध्यम से लगभग 65% वयस्क आबादी का टीकाकरण किया है।
6 मई, 2021 को, मॉडर्ना ने घोषणा की कि वह जल्द ही बीएलए अनुमति के लिए दस्तावेज जमा करेगा।
7 मई को, फाइजर ने घोषणा की कि उसने बीएलए अनुमति के लिए कार्यवाही शुरू कर दी है।
जॉनसन एंड जॉनसन ने एक ई-मेल में कहा कि वे 2021 के अंत तक बीएलए अनुमति के लिए आवेदन करेंगे।
तो आपको इससे क्या समझा?
जब अमेरिका में आपात स्थिति थी, तो उसने ईयूए के लिए अनुमति दी, और अब जब लगभग ६५% वयस्क आबादी को टीका लगाया जा चूका है, तो अब जिन्हें ईयूए की अनुमति दी गई थी, उन्हें अब बीएलए के लिए आवेदन करना होगा। साथ ही, अमेरिका ने अनुशंसा करना शुरू कर दिया है कि, अब नए ईयूए परमिट के बजाय बीएलए के लिए आवेदन करें, क्योंकि अब ईयूए की आवश्यकता नहीं है।
लेकिन हमारे देश में मीडिया ने एक तस्वीर बनाई है कि कोवाक्सिन को यूएसएफडीए ने खारिज कर दिया है क्योंकि यह खराब है। लेकिन सच्चाई अब आपके सामने है।
आखिर में मुझे बस यही कहना है कि, भारतीय मीडिया इस बात से खुश नहीं है कि, वैक्सीन हमारे देश में बन रही है, बल्कि अधूरी जानकारी देकर जनता को गुमराह करके देश को बदनाम करने का प्रयास कर रही है। मीडिया ने भारतीय जनता में भ्रम पैदा करने के लिए एक तस्वीर निर्माण की, कि कोवाक्सिन को अमेरिका में अस्वीकार कर दिया गया क्योंकि यह खराब है।
हम जानते हैं कि अधिकांश भारतीयों की मानसिकता, घर में कही गई बातों पर विश्वास करने की नहीं, बल्कि बाहर की बातो पर आंखें बंद करके विश्वास करने की होती है। इसलिए किसी भी खबर पर आंख मूंदकर विश्वास करने की बजाय उसके पीछे की सच्चाई को खोजने की कोशिश करें, ताकि आप गुमराह न हों।
